SHIVAM KUMAR SINGHहा मै भी इस भटकाव का शिकार हू। पर ये भटकाव अंदर बाहर दोनों है। पढ़ते वक़्त कभी किसी टॉपिक को गहराई से जानने के लिए फोन उठाया, और उसे सर्च…
शिवम जी, यह बात ध्यान देने लायक है। आप एक सच्ची ज़रूरत से शुरू करते हैं, टॉपिक को गहराई से समझना, और वहीं से फिसलन शुरू होती है, स्क्रॉल में। यानी भटकाव खुद को सबसे भोले भेस में पेश करता है, ज्ञान की तलाश के भेस में। इसीलिए पकड़ना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि शुरुआत बुरी नहीं लगती। और बाद का गुस्सा भी देख लें, वह गुस्सा किस पर है, समय पर, फोन पर, या उस पल में जो हुआ उसे स्वीकार न करने पर। खुद पर गुस्सा होना भी एक तरह से मामले को वहीं बंद कर देना है, बिना यह देखे कि उस पल क्या चाहिए था। आचार्य जी से जुड़ने के बाद जो परिवर्तन आया है, उसे बनाए रखने का सीधा रास्ता यही है, हर बार वह नीयत पकड़ना जो ज्ञान के नाम पर स्क्रीन तक ले जाती है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















