
✍🏻 पोस्ट 8 | 23 अक्टूबर ’26 💭 विषय ─ मानव उत्कृष्टता ──────────── 🇮🇳 फाँसी से तीन दिन पहले अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान ने अपनी दीदी को क्या लिखा था? 📍 16 दिसंबर 1927, फ़ैज़ाबाद जेल। 27 साल के अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान को तीन दिन बाद फाँसी होनी थी। उन्होंने साथी क्रांतिकारी शचींद्रनाथ बख्शी की बड़ी बहन को पत्र लिखा, जिन्हें वे प्यार से 'दीदी' कहते थे। लेकिन इस पत्र के पीछे आज़ादी के लिए किए गए वर्षों के संघर्ष की कहानी थी। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को शाहजहाँपुर में हुआ था। 1924 में वे राम प्रसाद बिस्मिल के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से भारत को आज़ाद कराना था। 🚂 9 अगस्त 1925 को उन्होंने साथियों के साथ काकोरी के पास ट्रेन से ब्रिटिश सरकार का धन अपने कब्ज़े में लिया, ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए पैसे जुटाए जा सकें। इसके बाद कई क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान कुछ समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे, लेकिन बाद में पकड़े गए और उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई गई। ✉️ अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा: "दीदी, मैं हमेशा के लिए अमर होने जा रहा हूँ।" उन्होंने दीदी से कहा कि बख्शी जेल से लौटें तो उन्हें उनका प्यार देना और बताना कि उन्होंने दृढ़ मन और प्रसन्न हृदय से अंतिम साँस ली। पत्र के अंत में उन्होंने लिखा: "खुश रहना, मैं एक वीर की तरह मर रहा हूँ।" 19 दिसंबर 1927 को उन्हें फ़ैज़ाबाद जेल में फाँसी दे दी गई। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का जीवन दिखाता है कि जब कोई काम निजी फायदे से अधिक महत्वपूर्ण हो, तो इंसान उसके लिए अपनी सुरक्षा और सुविधाएँ भी छोड़ सकता है। लेकिन त्याग का मूल्य केवल कुछ छोड़ने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि किसके लिए छोड़ा जा रहा है। सही काम वह नहीं जो हमें प्रशंसा दिलाए, बल्कि वह है जो डर और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर किया जाए। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान ने अपने लिए सुरक्षित जीवन चुनने के बजाय देश की आज़ादी को प्राथमिकता दी। ❓ जब सही काम करने की कीमत अपनी सुविधा छोड़ना हो, तब हम क्या चुनते हैं? A. सुविधा बचाने के लिए समझौता कर लेते हैं। B. सही जानते हैं, लेकिन डर के कारण रुक जाते हैं। C. पहले समझते हैं कि क्या ज़रूरी है, फिर उसकी कीमत चुकाते हैं। D. त्याग करते हैं, लेकिन बदले में सम्मान भी चाहते हैं। स्रोत: https://cafedissensusblog.com/2013/08/13/letter-of-shaheed-ashfaq-ullah-khan-to-sister-of-a-copatriot-sh-sachinder-nath-bakshi/
















































