
यह बहुत अच्छी चीज़ है देखने और समझने की कि रूप बदल गया है, लेकिन चीज़ आज भी वही है। आज हम अतीत को देखकर कहते हैं कि 👣 बाइंडिंग कितनी डरावनी प्रथा थी। लेकिन क्या हमने कभी यह देखा है कि वही चीज़ आज भी मौजूद है, बस उसका रूप बदल गया है? आज हम AI से अपनी ऐसी तस्वीरें बनवाते हैं, जिनमें हम खुद को वैसा देखना चाहते हैं, जैसा शायद हम हैं ही नहीं। कैमरे में फ़िल्टर लगाना, दूसरों के सामने सुंदर दिखने की चाह, सोशल मीडिया पर लाइक्स और फ़ॉलोअर्स की लालसा — क्या ये सब उसी बंधन के नए रूप नहीं हैं? तब हम अपने शरीर को बाँधते थे, आज हम अपनी छवि के बंधन में बँध रहे हैं। अतीत की प्रथाओं को देखकर सवाल उठाना आसान है, लेकिन क्या हम अपने वर्तमान को भी उसी नज़र से देख पाते हैं? क्या यह सब हम नहीं करते?



















