
✍🏻 पोस्ट 11 | 31 जुलाई '26 💭 विषय — तकनीक / कृत्रिम बुद्धिमत्ता ────────── 🕣 अगर उठना ही नहीं था, तो 8 अलार्म क्यों लगाए? 📱 झुन्नु अकेला नहीं है। दुनिया भर में करोड़ों लोग एक के बाद एक कई अलार्म लगाते हैं या स्नूज़ (Snooze) का सहारा लेते हैं। 🤖 यही कारण है कि स्मार्टफ़ोन के अलार्म ऐप्स केवल एक अलार्म रखने के लिए नहीं बनाए जाते। Android और iPhone दोनों में कई अलार्म बनाने और बार-बार स्नूज़ करने की सुविधा पहले से दी जाती है। 📊 Scientific Reports (2023) में प्रकाशित 21,000 से अधिक लोगों के स्मार्टफ़ोन अलार्म डेटा के विश्लेषण में पाया गया कि लगभग 57% लोग नियमित रूप से स्नूज़ बटन का उपयोग करते हैं। स्नूज़ करने वाले लोग औसतन 2–3 बार स्नूज़ दबाते हैं और लगभग 20 मिनट अतिरिक्त बिस्तर में बिताते हैं। ⏰ यही वजह है कि अलार्म ऐप्स की डिज़ाइन इस उम्मीद पर नहीं बनाई जाती कि आप पहली घंटी में उठ जाएँगे। उनकी डिज़ाइन ही ऐसी होती है कि आप कई अलार्म लगा सकें या अलार्म हर कुछ मिनट बाद दोबारा बजता रहे। 🧠 लेकिन हम ऐसा करते ही क्यों हैं? 😴 Sleep Medicine Reviews में प्रकाशित शोध बताते हैं कि अलार्म बजने के तुरंत बाद हमारा मस्तिष्क पूरी तरह सक्रिय नहीं होता। इस अवस्था को स्लीप इनर्शिया कहा जाता है, जिसमें कुछ समय के लिए सतर्कता, निर्णय लेने की क्षमता और आत्म-नियंत्रण कम हो जाता है। 🍩 इसी दौरान हमारा मस्तिष्क तत्काल मिलने वाले छोटे सुख को अधिक महत्व देता है। इसे Present Bias या Hyperbolic Discounting कहा जाता है। इसलिए "बस पाँच मिनट और सो लूँ" का सुख, समय पर उठने के लाभ से ज़्यादा आकर्षक लगने लगता है। 🔁 जब यही व्यवहार रोज़ दोहराया जाता है, तो मस्तिष्क यह सीख लेता है कि पहला अलार्म उठने का संकेत नहीं, बल्कि "अभी थोड़ा और सो सकते हो" का संकेत है। धीरे-धीरे कई अलार्म लगाना एक आदत बन जाती है, और तकनीक भी अपनी डिज़ाइन में इसी व्यवहार को ध्यान में रखती है। सुबह न उठ पाना आलस नहीं है। 🎭 असल बात यह है कि हम उसी दिशा में सहजता से बढ़ते हैं, जहाँ हमारे केंद्र को अपना लाभ, सुरक्षा या पहचान दिखाई देती है। अगर बिस्तर छोड़ने में उसे न सुरक्षा दिखती है, न लाभ, तो वह हर अलार्म के बाद कहता है, "बस पाँच मिनट और।" 🚨 लेकिन जिस दिन परीक्षा हो, इंटरव्यू हो या नौकरी जाने का डर हो, वही 'मैं' पहले अलार्म पर उठ बैठता है। रातों-रात ऊर्जा पैदा नहीं होती, बस अहंकार को अपना हित दिखाई देने लगता है। 🪞 अलार्म हमारी नींद की नहीं, हमारे केंद्र की कहानी बताते हैं। हम वहाँ तुरंत सक्रिय हो जाते हैं जहाँ 'मैं' को अपना बचाव, लाभ या पहचान दिखाई देती है। ❓ज़रा अपने दिन पर नज़र डालिए। आपके ज़्यादातर फैसले किससे तय होते हैं समझ से या अपने स्वार्थ और डर से? 💭 समस्या अलार्म की नहीं है। अलार्म तो केवल यह दिखाता है कि हमें चलाने वाला केंद्र क्या है। स्रोत: https://www.nature.com/articles/s41598-025-99563-y











































