
मेरा अनुभव इससे थोड़ा अलग रहा है। मैं बहुत कम ही अलार्म लगाती हूँ, लेकिन जब लगाती हूँ तो सामान्यतः उसी पर उठ जाती हूँ। छात्र जीवन में परीक्षा के दिनों में अलार्म लगाया करती थी। आश्चर्य की बात यह थी कि कई बार अलार्म बजने से ठीक पहले ही मेरी आँख खुल जाती थी। कभी सिर्फ़ घड़ी के अलार्म से पहले आने वाली हल्की-सी टक की आवाज़ से, तो कभी अलार्म की केवल पहली ही रिंग पर। उस समय समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों होता है। अब सोचती हूँ, शायद उन दिनों मेरी नींद बहुत हल्की होती थी, या फिर परीक्षा का महत्व मन में इतना गहरा होता था कि मस्तिष्क पहले से ही सजग रहता था। इसलिए अलार्म केवल औपचारिकता बनकर रह जाता था।



















