
✍🏻 पोस्ट 26 | 27 अक्टूबर ’26 💭 विषय — विश्व दर्शन ──────────── 📖 बाइबल के यूहन्ना 8:1–11 में जीसस और एक स्त्री की कहानी मिलती है। 🌅 एक सुबह जीसस मंदिर में लोगों को शिक्षा दे रहे थे। तभी कुछ धार्मिक नेता एक स्त्री को उनके सामने लाए। उस स्त्री पर विवाह के बाहर किसी पुरुष से संबंध बनाने का आरोप था। उस समय इसे गंभीर अपराध माना जाता था। ⚖️ नेताओं ने जीसस से पूछा, “मूसा के कानून के अनुसार इस स्त्री को पत्थर मारकर सज़ा देनी चाहिए। आप क्या कहते हैं?” दरअसल, वे जीसस को फँसाना चाहते थे, ताकि उनके जवाब के आधार पर उन पर आरोप लगा सकें। 🙏 जीसस ने क्या किया? जीसस झुके और उँगली से ज़मीन पर लिखने लगे। जब लोग बार-बार सवाल पूछने लगे, तो जीसस खड़े हुए और बोले- “तुममें जिसने कभी कोई गलत काम नहीं किया, वही इस स्त्री को पहला पत्थर मारे।” यह सुनकर लोग एक-एक करके जाने लगे। सबसे पहले बुज़ुर्ग गए। अंत में केवल जीसस और वह स्त्री रह गए। 🪞 इस कहानी में छिपा बड़ा सवाल समाज किसी काम को गलत घोषित कर दे, तो हम अक्सर बिना सोचे उसके साथ खड़े हो जाते हैं। भीड़ का समर्थन हमें यह भरोसा देता है कि हम सही पक्ष में हैं। अहंकार को अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए किसी दूसरे को नीचा दिखाना आसान लगता है। लेकिन जीसस के एक सवाल ने भीड़ से मिला यह भरोसा छीन लिया। ❓ जब समाज किसी को गलत ठहराता है, तो आप क्या करते हैं? A. भीड़ के फैसले को सही मान लेते हैं। B. दूसरों को सज़ा दिलाने में साथ देते हैं। C. समाज की मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं। D. अपनी छवि बचाने के लिए चुप रहते हैं। 🔗 Source: https://www.biblesociety.org.uk/explore-the-bible/read/eng/GNB/John/8
















































