
परिवार और समाज में तो ये चुनाव दिखता है कि विरोध करें, या कम-से-कम भीतर से थोड़ी दूरी बनाकर रखें। लेकिन जब बात अपनी महत्वाकांक्षा की आती है, तो वहाँ मामला थोड़ा कठिन हो जाता है। वहाँ लगता है कि ये तो मेरी इच्छा है, ये तो होनी ही चाहिए। और फिर यहीं पर फँस जाते है। क्योंकि अपनी इच्छा या महत्वाकांक्षा पूरी करने जब जाते हैं, तो फिर उसी समाज और परिवार के सामने झुकना पड़ता है जिसका शुरू में विरोध करके आगे बढ़े थे। शुरुआत में तो एक तरह से ये सोचकर जाते हैं कि इस्तेमाल कर लेंगे, फिर छोड़ देंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। उल्टा, हम ही फँसने का चुनाव करने लगते हैं।



















