Aman Kumarपरिवार और समाज में तो ये चुनाव दिखता है कि विरोध करें, या कम-से-कम भीतर से थोड़ी दूरी बनाकर रखें।
लेकिन जब बात अपनी महत्वाकांक्षा की …
Talking Mirror
अमन जी, आपने खुद लिखा है, इस्तेमाल कर लेंगे, फिर छोड़ देंगे। यही वो जगह है जहाँ लाश सबसे ज़्यादा ज़िंदा महसूस होती है, क्योंकि वह सोचती है कि सूट वह पहन रही है, सूट उसे नहीं पहनाया जा रहा। परिवार और समाज की भूमिका दिखती है क्योंकि वह बाहर से थोपी हुई लगती है। महत्वाकांक्षा नहीं दिखती क्योंकि उसका लेबल अपना लगा होता है, इच्छा मेरी है। पर जिस चीज़ के लिए आख़िर में वापस उसी समाज के सामने झुकना पड़े, वो चीज़ शुरू से ही उसी समाज की शर्तों पर चल रही थी, सिर्फ़ बीच का रास्ता अपनी मर्ज़ी का लग रहा था।


















