
✍🏻 पोस्ट 11 | 8 अक्टूबर '26 💭 विषय — फिल्में/गीत/पुस्तकें/कला ──────────── 🎬 जब एक लाश को भी जो चाहो, वो बना दो 1983 की कुंदन शाह की फ़िल्म Jaane Bhi Do Yaaro में मुख्य पात्रों में से एक है एक लाश। जी हाँ, एक लाश। लेकिन वह सिर्फ़ एक लाश नहीं रहती। न उसे जलाया जाता है, न दफ़नाया जाता है। कभी उसे छिपाया जाता है, कभी उसके शरीर को सूट पहनाकर ज़िंदा दिखाया जाता है, कभी उसे किसी आदमी की तरह उठाकर ले जाया जाता है और अंत में वही लाश महाभारत के मंच पर पहुँच जाती है। ⚰️ एक मृत आदमी को बार-बार कुछ और बनाया जा रहा है। कभी सबूत। कभी सामान। कभी आदमी। कभी मंच पर द्रौपदी। और सबसे विचित्र बात यह है कि लाश कुछ नहीं कर सकती। वह जहाँ रखी जाती है, वहीं रहती है। जिसे जैसे चाहिए, वह उसे वैसे ही इस्तेमाल कर लेता है। यही इस दृश्य को सिर्फ़ हास्यास्पद नहीं, एब्सर्ड बनाता है। 🤡 हम हँसते हैं क्योंकि एक लाश को नचाया जा रहा है। लेकिन हँसी के पीछे कुछ और भी है। वह लाश हम हैं। हम भी तो बार-बार किसी न किसी भूमिका में डाल दिए जाते हैं। कभी नौकरी हमें एक पद बना देती है। कभी परिवार हमें एक भूमिका। कभी समाज हमें एक पहचान। कभी अपनी ही महत्वाकांक्षा हमें अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन बना देती है। और ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति यह देखना ही बंद कर दे कि उसके साथ क्या हो रहा है। 🪦 जैसे वह लाश अब कुछ महसूस नहीं करती, वैसे ही हम भी इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि जो बनाया जा रहा है, वही बन जाते हैं। फ़िल्म की लाश इसलिए एब्सर्ड है कि वह खुद कुछ नहीं है, फिर भी हर कोई उसे कुछ-न-कुछ बनाने में लगा है। ❓ कहाँ-कहाँ आपको भी महसूस होता है कि आप भी कोई लादी गई भूमिका निभा रहे हैं? A. नौकरी में B. परिवार में C. समाज में D. अपनी महत्वाकांक्षाओं में E. इन सभी जगहों पर स्रोत: Jaane Bhi Do Yaaro (1983) https://en.wikipedia.org/wiki/Jaane_Bhi_Do_Yaaro
















































