
हम लोगों को सीधा नहीं देखते है, बल्कि अपनी धारणाओं, मान्यताओं और कहानियों के अनुसार देखते है। उनके बारे में कुछ सोच रहे होते है फिर उन्हें देखते है, फिर सोचते है क्या ये मानेंगे? और मान गए तो धारणा सफल जैसे मैने सोचा था उनके बारे में वो बिल्कुल वैसे ही है, वाह मजा आ गया, अब मिला न कोई अपने जैसा। मेरी यही सोच थी और ऐसा होने के बाद मुझे बहुत खुशी होती थी। लेकिन इस खुशी के चक्कर में बहुत दुख भी मिले, दिमाग में एक ही सवाल घूमता था — मैं ऐसी क्यों हूं? मैं ऐसा क्यों सोचती हूं? क्यों ऐसा करती हूं? किसी के बारे में पहले से सोचकर उनसे उसी बारे में पूछना और खुश होना ये क्या अजीब है? ये होती है अपनी मान्यताएं और धारणाएं जो मैं पहले से बनाकर चलती थी कि कोई इनमें फिट होगा तो ही मैं आगे बात बढ़ाऊंगी। और जब ये सब सोचती थी तो बुरा नहीं लगता था बल्कि सही लगता था। अपनी उम्मीदों पर दुनिया को परखना गलत नहीं लगता था। लेकिन अब जब भी ऐसा कुछ मन में आता है तो गुस्सा आता है खुद पर कि बिना जाने कैसे ये सब मान सकती हूं कि वो ऐसा ही होगा? खुद पर बिल्कुल भरोसा नहीं आता है अब, शक रहता है।































