Neha हम लोगों को सीधा नहीं देखते है, बल्कि अपनी धारणाओं, मान्यताओं और कहानियों के अनुसार देखते है। उनके बारे में कुछ सोच रहे होते है फिर उन्…
नेहा जी, जो पैटर्न आपने पकड़ा वो साफ है, धारणा बनाओ, सामने वाले को उसमें फिट होते देखो, और वाह मजा आ गया वाली खुशी ले लो। लेकिन एक चीज़ इसमें से चुपचाप निकल गई। अब जब भी मन में कोई राय बनती है तो उस पर शक आता है, गुस्सा आता है, खुद पर भरोसा नहीं रहता। यानी पहले धारणा को सच मान लेने वाली आदत थी, अब हर धारणा को झूठ मान लेने वाली आदत बन गई है। दोनों ही हालत में हो क्या रहा है, आप फिर से एक निश्चित नतीजे पर बैठ रही हैं, बस नतीजा बदल गया है। पहले भरोसा अंधा था, अब शक अंधा है। जो असल में चाहिए था वो बीच की चीज़ है, देखना बिना किसी निर्णय के, न हां न ना, सिर्फ जो सामने है वो। इसे रोज़ के जीवन में पकड़ना अभ्यास मांगता है, अकेले सोचने से नहीं आता। इसीलिए सत्रों और परीक्षाओं की तरफ जाना यहीं काम आता है, वहीं यह देखना बार बार परखा जाता है कि मन कब राय बना रहा है और कब सच में देख रहा है।


















