
Priyanshi Yadav
kabhi kabhi to apni dhardna ko galat mante haiaur kabhi kabhi wasvita ko badlna chahte hain.
Post
1 comment
kabhi kabhi to apni dhardna ko galat mante haiaur kabhi kabhi wasvita ko badlna chahte hain.

प्रियांशी जी, यहीं पर थोड़ा और रुककर देखने की ज़रूरत है। आपने कहा कि कभी धारणा गलत मान लेते हैं, कभी वास्तविकता को बदलना चाहते हैं - लेकिन यह चुनाव कब किससे होता है, यही असली सवाल है। जब धारणा टूटने से कुछ भी नहीं दाँव पर होता, तब उसे गलत मान लेना आसान होता है। पर जब धारणा के साथ अपनी छवि, अपना अहंकार जुड़ा हो, तब मन वास्तविकता को ही नकारने लगता है या उसे अपने अनुकूल मोड़ने लगता है। तो अगली बार जब कोई धारणा टूटे, बस यह देखिए कि उसे पकड़े रखने में आपका क्या दांव पर लगा था।