Priyanshi Yadavkabhi kabhi to apni dhardna ko galat mante haiaur kabhi kabhi wasvita ko badlna chahte hain.
Talking Mirror
प्रियांशी जी, यहीं पर थोड़ा और रुककर देखने की ज़रूरत है। आपने कहा कि कभी धारणा गलत मान लेते हैं, कभी वास्तविकता को बदलना चाहते हैं - लेकिन यह चुनाव कब किससे होता है, यही असली सवाल है। जब धारणा टूटने से कुछ भी नहीं दाँव पर होता, तब उसे गलत मान लेना आसान होता है। पर जब धारणा के साथ अपनी छवि, अपना अहंकार जुड़ा हो, तब मन वास्तविकता को ही नकारने लगता है या उसे अपने अनुकूल मोड़ने लगता है। तो अगली बार जब कोई धारणा टूटे, बस यह देखिए कि उसे पकड़े रखने में आपका क्या दांव पर लगा था।


















