Clouded is the ‘I’, not the Sky || Acharya Prashant, on Avadhuta Gita (2018)
Acharya Prashant
Why did God create the universe? || Acharya Prashant, on Ribhu Gita (2018)
आशा और कष्ट, दुख और तुलना || आचार्य प्रशांत (2018)
आचार्य प्रशांत
हम तुम्हारे समीप ही, मन जाए कहीं भी || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)
संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो || आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर (2014)
महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना || आचार्य प्रशांत (2015)
समाज द्वारा संस्कारित मन निजता से अनछुआ || आचार्य प्रशांत (2013)
न समर्थन, न विरोध || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
गुरु के प्रति धन्यवाद कम क्यों हो जाता है? || आचार्य प्रशांत (2017)
संवेदनशीलता ही वास्तविक सभ्यता है || आचार्य प्रशांत (2014)
गुरु का काम क्या है? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2015)
व्यक्ति इकट्ठा क्यों करता है? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2015)
जो मुक्त है वही बंध सकता है || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2013)
सभ्यता किस लिए है? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
कर्तव्य और धर्म जितने अलग हैं, धर्म और प्रेम उतने ही एक || आचार्य प्रशांत (2015)
दाएँ हाथ से दो तो बाएँ को पता ना चले || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2013)
कभी रंग कभी धूप कभी धूमिल मैदान है,बदलते मौसमों में भी आसमान तो आसमान है || आचार्य प्रशांत (2015)
What are hobbies and interests? || Acharya Prashant (2015)
Any and every image you make of yourself is an ugly image || Acharya Prashant (2014)
Have much? Get more. Have little? Lose all! || Acharya Prashant, on Jesus Christ (2015)
मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
इस शरीर की वास्तविकता || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)
एक भय परम तक भी ले जाता है || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2017)
What is the right time to turn spiritual? || Acharya Prashant (2015)
मनुष्य वृत्तियों की भूमि पर परिस्थितियों का फैलाव है || आचार्य प्रशांत (2015)
अनुकम्पा, निर्णय और उचित कर्म || आचार्य प्रशांत (2018)
Why is it difficult to change one's behaviour? || Acharya Prashant (2015)
अँधेरा क्यों लुभाता है? || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2016)
What is escaping? || Acharya Prashant (2014)
अमूल्य से निकटता ही मूल्यहीन का त्याग है || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)