विश्राम मनुष्य का सहज स्वभाव और अस्तित्व का केन्द्रीय मूल्य है || आचार्य प्रशांत (2015)
आचार्य प्रशांत
अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं || आचार्य प्रशांत (2013)
प्रेमी मात्र एक है अन्य का क्या विचार || आचार्य प्रशांत (2014)
कायम रहे तुम्हें देखती नज़र मेरी || आचार्य प्रशांत, बाबा फ़रीद पर (2015)
झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन || आचार्य प्रशांत (2015)
The Grace that melts and enslaves || Acharya Prashant (2015)
Acharya Prashant
स्वीकृति की चाह और नियन्त्रण का भाव || आचार्य प्रशांत (2014)
मुक्ति व बंधन दोनों ही में रहने के लिए मुक्त है मनुष्य || आचार्य प्रशांत (2015)