
कामवासना” एक ऐसा विषय उठाती है जिसके बारे में लोग या तो खुलकर बात नहीं करते या फिर उसे गलत तरीके से समझते हैं। इस किताब ने मुझे यह समझने में मदद की कि कामना केवल शरीर से जुड़ी चीज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे मन, डर और अज्ञान से गहराई से जुड़ी हुई है। किताब पढ़ते हुए यह साफ हुआ कि हम अक्सर अपने ही शरीर और इच्छाओं को गलत नजरिए से देखते हैं—कभी उन्हें दबाते हैं, तो कभी उनमें खो जाते हैं। आचार्य प्रशांत ...