
मैं इस किताब को पढ़ने से पहले ही मांसाहार छोड़ चुकी थी, लेकिन बात बस मांसाहार छोड़ने की नहीं है।जब मैं यह किताब पढ़ी तो मुझे समझ में आया कि शाकाहार तभी सार्थक है जब वह आत्मज्ञान से फलित हो अगर वह संस्कार से आ रहा है तो वह शाकाहार बड़ा व्यर्थ है, जब हम किसी बकरी के बच्चे को मारते है तो हम अपने बच्चों की प्रति प्रेम पूर्ण नहीं रह सकते हैं ।यह बिल्कुल हो ही नहीं सकता अगर हम एक बकरी के बच्चे के प्रति ...