
दूध, माँस, हिंसा

यह किताब सीधे-सीधे मांसाहार, हिंसा और इंसान की संवेदनहीनता पर सवाल उठाती है। नाम से ही साफ है कि यह कोई हल्की-फुल्की किताब नहीं है—यह आपको uncomfortable बनाती है। किताब की सबसे बड़ी ताकत है इसकी सीधी और तीखी भाषा। आचार्य प्रशांत यहाँ घुमा-फिराकर बात नहीं करते, बल्कि सीधे पूछते हैं— 👉 क्या हम सच में संवेदनशील हैं, या सिर्फ अपने स्वार्थ में जी रहे हैं? यह सिर्फ खाने की बात नहीं करती, बल्कि मानव मन ...