जाका गला तुम काटिहो (Jaaka Gala Tum Kaatiho)

जाका गला तुम काटिहो (Jaaka Gala Tum Kaatiho)

दूध, माँस, हिंसा
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Paperback Details
Hindi Language
220 Print Length
Description
शाकाहार तभी सार्थक है जब वह आत्मज्ञान से फलित हो। संस्कारगत आया हुआ शाकाहार बड़ा व्यर्थ है।

अध्यात्म एक बूटी है जिसके फायदे हज़ार हैं। सच आएगा जीवन में तो अहिंसा भी आएगी, अवैर भी आएगा, अपरिग्रह भी आएगा, अस्तेय भी आएगा। जानवर कट ही इसलिए रहे है क्योंकि आदमी के जीवन में सच नहीं है।

हम जानते ही नहीं है कि 'हम हैं कौन'। हम जानते ही नहीं है कि 'खाना' माने होता क्या है!

हम उपभोगवादी युग में जी रहे है। जो कुछ भी दिख रहा है, वो हमारे लिए बस भोग की एक वस्तु है। वो इसलिए, क्योंकि 'अध्यात्म' को तो हमने कूड़ा-करकट समझकर के बिलकुल फेंक दिया है।

जब आप अध्यात्म को फेंक देते हो 'कूड़ा' जानकर, तो जीवन में ज़बरदस्त अपूर्णता आ जाती है। उसी अपूर्णता से फलित होता है माँसाहार।
Index
CH1
रुक जाओ, अब बस करो!
CH2
हिंसा क्या है?
CH3
कब हटेगी हिंसा?
CH4
अपने ही प्रति हिंसा है माँसाहार
CH5
जानवरों के प्रति व्यवहार, और आपके मन की स्थिति
CH6
हम पशुओं को क्यों मारते हैं?
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