
दुर्गासप्तशती में देवी प्रकृति का स्वरूप है और जो प्रकृति को भोगना चाहते है वो सभी राक्षस ही है । राक्षस कोई अलग से पैदा होने वाला प्राणी नहीं वो मनुष्य ही है जो प्रकृति को मां नहीं भोगने की वस्तु मानते है । प्रकृति मां है ,पत्नी नहीं । जो उन्हें भोगने को आतुर हो वही राक्षस है। पृथ्वी को जो लगातार अपने भोग के लिए इस्तेमाल कर रहे है वहीं है शुंभ निशुंभ । प्रकृति के बालकों अर्थात जानवरों को खा रहे ह...