देवता हो या दानव हो हमारे भीतर का, उसका सत्य से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध तो रहेगा ही। सत्य बड़ा जैसे दुर्निवार है, उससे आप पीछा नहीं छुड़ा सकते, वो आपका आधार है। प्रश्न यह है कि उस आधार से आपका सम्बन्ध क्या रहता है।