
दुर्गासप्तशती” को आमतौर पर लोग सिर्फ एक धार्मिक पाठ या पूजा-पाठ का हिस्सा मानते हैं। लेकिन इस किताब में इसे जिस तरह समझाया गया है, वह इसे सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि गहराई से मनोवैज्ञानिक और आंतरिक यात्रा बना देता है। किताब यह दिखाने की कोशिश करती है कि देवी-देवताओं और असुरों की कहानियाँ बाहर की घटनाएँ नहीं, बल्कि हमारे भीतर चल रहे संघर्षों का प्रतीक हैं। यह दृष्टिकोण काफी अलग है और कई बार पुराने वि...