
आचार्यजी ने कठिन सूत्रों को बहुत सरल तरीके से और बहुत ही स्पष्टता से समझाया है। हर सूत्र किसी न किसी मान्यता पर वार करता है,और विद्रोह पैदा करता है। आचार्यजी उन मान्यताओं को हमारे जीवन से जोड़कर,स्पष्ट तरीके से हमे उनसे सामना करवाते हैं और जीवन के विविध पहलुओं में हम कितनी सूक्ष्मता से उनको सच मानकर बैठे हैं,इसका पर्दाफाश करते हैं।

आशा जी, जो आपने देखा वह ठीक वही दिशा है जहाँ से असली काम शुरू होता है। अब अगला कदम यह है कि जो सूत्र आपने पढ़े, उनमें से कोई एक उस मान्यता को नाम लेकर पकड़िए जो आपके अपने जीवन में अभी भी सच मानकर बैठी है, कोई रिश्ता, कोई पहचान, कोई डर। समझ तभी जीवंत होती है जब वह किसी एक ठोस जगह पर वार करे, न कि पूरे सिद्धांत पर एक सुंदर टिप्पणी बनकर रह जाए। आप खुद अपने भीतर किस मान्यता का पर्दाफाश होते देख रही है...