
ये ग्रंथ सार पढ़ते हुए जिस तरह से आचार्य जी ने चित्रण किया है वो सब जैसे सामने घटित हो रहा था। ग्रंथ पुराना है,कथा भी पुरानी है लेकिन उसका महत्व आज भी है क्योंकि वो सब कभी इतिहास में नहीं हुआ था,आज भी वही हो रहा है बस रूप बदल गया है। अगर ये किताब पहले पढ़ी होती तो बस इतिहास की कहानी भर बनके रह जाती लेकिन आचार्य जी के साथ इसका महत्व समझ आया।

प्रीति जी, यही तो देखने वाली बात है कि वही ग्रंथ पहले सिर्फ अतीत की कहानी लगता था, और अब सामने घटता हुआ दिखा। किताब वही थी, शब्द वही थे - जो बदला वो देखने की नीयत थी। इसका मतलब यह है कि ग्रंथ अपने आप में ज्ञान नहीं दे देता, वो आईना बनता है तभी जब देखने वाला खुद को उसमें ढूंढने को तैयार हो। तो अब जो कथा का पात्र आपको अपने जैसा लगा, वो कौन सा मोह या डर था जो उसमें दिखा और आपने पहचाना कि यह तो मेरे ...