
कबीर साहब के भजन 'तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे' की व्याख्या के माध्यम से आचार्य प्रशांत बताते हैं कि असली समस्या मन की नहीं, बल्कि अहंकार की है, नीयत की है। बहुत ही सरल और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से यह पुस्तक आत्मचिंतन और आत्मबोध का मार्ग दिखाती है।