तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे (Tera Mera Manua Kaise Ek Hoi Re) [नवीन प्रकाशन]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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eBook Details
HindiLanguage
Description
सुनने में सरल-सा लगने वाला यह भजन असल में आपके जीवन की सबसे गहरी उलझन को छूता है। क्यों मन कभी एक नहीं होता? क्यों हर रिश्ता, हर प्रयास अंततः खिंचाव और टकराव बन जाता है?
कबीर साहब के प्रसिद्ध भजन पर आधारित यह पुस्तक आचार्य प्रशांत द्वारा की गई सुसंगत वेदांतिक व्याख्या है। वे भजन को भाव और भक्ति की परतों से अलग कर उस मूल प्रश्न को सामने रखते हैं जहाँ समस्या मन की नहीं, बल्कि ‘अहंकार’ की है जो अलग बने रहने से ही जीवित रहता है।
आचार्य प्रशांत ‘मिठाई’ और ‘दवाई’ जैसे सहज और समकालीन उदाहरणों से उस भीतरी चालाकी को स्पष्ट करते हैं जिसके द्वारा अहंकार अक्सर भक्ति और प्रतीकों की आड़ में रस तो ले लेता है, पर इसके मर्म से स्वयं को सुरक्षित दूरी पर रखता है।
आपको हार्दिक आमंत्रण है, संतों का हाथ थाम लीजिए। फिर मन से उलझना नहीं पड़ता, और उस ‘मैं’ की पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगती है जो मन को उलझाए रखता है।