Acharya Prashant (AP) Books | मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे | Moko Kahan Dhunde Re Bande [New Release]
मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे | Moko Kahan Dhunde Re Bande [New Release]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
HindiLanguage
90Print Length
Description
मनुष्य जीवन एक अनवरत खोज का दूसरा नाम है। यह खोज कभी घर, गाड़ी, धन और सफलता का रूप लेती है, तो कभी शांति, ईश्वर या मुक्ति की चाह बन जाती है। उसके रूप भले बदलते रहें, पर एक बात अपरिवर्तित रहती है: खोज समाप्त नहीं होती, और खोजी बना रहता है। कबीर साहब का कालजयी भजन “मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में” इसी बेचैन खोजी के केंद्र पर सीधी चोट करता है।
हमारे देखे यह एक तथ्य है कि जीवन में कुछ कमी है, और उस कमी को संसार की बाहरी चीज़ें ही भर सकती हैं। इसी मान्यता के कारण हम वस्तुओं, संबंधों, तीर्थों, मूर्तियों, साधनाओं, यहाँ तक कि धर्म के नाम पर भी वह खोजते फिरते हैं जो वहाँ मिल ही नहीं सकता। समस्या बाहरी साधनों में नहीं, भीतर जमी उन धारणाओं की है जो हमें अपने ही निकटतम सत्य से दूर रखती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इस भजन की विस्तृत व्याख्या के माध्यम से दिखाते हैं कि सत्य और मान्यता साथ नहीं चल सकते। यह व्याख्या पाठक को अपनी ही कहानियों और भीतर के उस अंधेरे को परखने की दृष्टि देती है, जिसने उसकी खोज को अब तक जीवित रखा है। यह पुस्तक “मैं तो तेरे पास में” के मूल में स्थित उस ‘मैं’ को समझने की एक जीवंत संभावना खोलती है, जो पास होकर भी नज़र नहीं आता।
ये पुस्तक उस खोजी को जाँचने का एक सटीक माध्यम है जो जीवन भर बैचैन रहता है और अपनी उस बेचैनी और खालीपन को बाहरी वस्तुओं और विषयों में तलाशता रहता हैं, अपनी ही मान्यताओं और धारणाओं के चलते अपने सत्य से दूर रहता है जो उसके बिल्कुल करीब ही हैं।
Sandhya Anathi Satyanarayan
3mo
मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे किताब
कबीर साहब के भजन को समझने का एक नया तरीका मिला। किताब छोटी-छोटी बातों से मन को शांत और सोचने वाला बना देती है।