Acharya Prashant (AP) Books | घूँघट के पट खोल रे | Ghunghat Ke Pat Khol Re [New Release]
घूँघट के पट खोल रे | Ghunghat Ke Pat Khol Re [New Release]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
HindiLanguage
124Print Length
Description
इंसान जन्म लेता है ताकि जैसा जन्म लिया है, वैसा ही जीवन न जिए। हमारी सारी गति, सब कामनाएँ और अनेक दिशाओं में लगाई गई ऊर्जा इसी ओर संकेत करती हैं। आचार्य प्रशांत कहते हैं कि ऊर्जा तो हमेशा प्रेम की होती है, लेकिन उस ऊर्जा को ज्ञान की रोशनी चाहिए होती है।
प्रस्तुत पुस्तक में कबीर साहब के भजन “घूँघट के पट खोल रे” की व्याख्या करते हुए इसी बात को आचार्य प्रशांत चुहिया और गजराज की उपमा से समझाते हैं। आत्मज्ञान के अभाव में अहंकार स्वयं को चुहिया मानता है। वह खुद को बिल की सुविधाओं में सुरक्षित समझता है, और उसी बिल में गजराज की मूर्ति स्थापित करके खुद को गजराज के मिल जाने की झूठी तसल्ली देता है। अपनी ऊर्जा को वह इन्हीं सीमाओं को बचाए रखने में खर्च करता है, लेकिन यह नहीं देखता कि वही बिल उसे सीमाओं में भी बाँधता है।
इसी अज्ञान, भ्रम और मान्यता को कबीर साहब भजन में “घूँघट” कहते हैं, और “पिया” उस पूर्णता का प्रतीक हैं जो मनुष्य की मूल चाह है। वास्तव में पिया दूर नहीं हैं; बाधा केवल वह घूँघट है जिसे अहंकार अपनी रक्षा समझ बैठा है। यह पुस्तक इसी घूँघट को पहचानने का आमंत्रण है। जब काल्पनिक सुरक्षा और कमज़ोरी के घूँघट उतरते हैं, तो प्रेम को सही दिशा मिलती है और ऊँचे उठने का साहस भीतर से जागने लगता है।
कबीर साहब के प्रसिद्ध भजन "घुँघट के पट खोल रे" की भावना से परिचय कराती यह पुस्तक वास्तव में एक अमूल्य उपहार है। इसे पढ़ते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो हमारे जीवन के झूठे आवरण, भ्रम और आत्म-छल की परतें एक-एक करके हट रही हों। यह पुस्तक हमें हमारी वास्तविक स्थिति से परिचित कराती है और स्वयं को ईमानदारी से देखने का साहस भी प्रदान करती है।
Sandhya Anathi Satyanarayan
3mo
घूँघट के पट खोल रे किताब
किताब की भाषा बहुत सरल है, पर बातें सोचने पर मजबूर करती हैं।