चलना है दूर मुसाफ़िर | Chalna Hai Dur Musafir [New Release]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
HindiLanguage
124Print Length
Description
चलना है दूर मुसाफ़िर, कबीर साहब के सुप्रसिद्ध भजनों में से एक है। जीवन की स्थिति और उसमें क्या करणीय है, इन गहरी बातों को यह भजन इतनी सरलता से सामने रखता है कि एक खतरा भी पैदा होता है—कहीं हम सुनते-गुनगुनाते हुए इसकी मूल सीख से चूक न जाएँ।
इस सारगर्भित भजन का केंद्रीय संदेश यही है कि जीवन एक अनवरत यात्रा है और हम यात्री। संसार की किसी उपलब्धि, संबंध या वस्तु में वह आखिरी चैन नहीं मिला है जिसकी हम सबको तलाश रहती है। हम कहीं ठहरना चाहें भी तो वही बेचैनी याद दिलाती है कि यात्रा अभी बाकी है।
अगर हम सचमुच यात्री हैं, तो सवाल उठता है: चलें कैसे? यह कोई साधारण यात्रा नहीं, यात्री को अपने मन में उतरकर उसकी बेचैनी के मूल तक पहुँचना है। मुक्ति की इस यात्रा में जगत के साधनों का उपयोग तो करना है, पर उतना ही जितना आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है। कबीर साहब त्याग नहीं, सजगता की बात कर रहे हैं: साधन और विश्राम हों, पर ठिकाना न बन जाएँ।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन के मर्म को सजीवता से खोलते हुए स्पष्ट करते हैं कि वस्तुएँ अपनेआप में बंधन नहीं हैं; उनसे जुड़ी हमारी कल्पनाएँ और आशाएँ ही मुक्ति की यात्रा में बाधा बनती हैं, जिसे कबीर साहब माया-मोह की गठरी कहते हैं। सहज लगने वाली इन भजन की पंक्तियों में वेदांत का मूल दर्शन ही समाया हुआ है। यह पुस्तक वेदांत के सूत्रों को सुग्राह्य बनाते हुए पाठक को उन्हें जीवन में उतारने की स्पष्टता देती है।