
गीता एक आग है, जो आप को पकड़ लेगी तो छोड़ेगी नहीं, अभी तक लगता है की मन है ,अहम है , कहने का मतलब, फल है, कर्म है, और कर्ता है , फल पर मेरा अधिकार नही है,ये समझ में आया था, फिर गीता अंदर तक थोड़ी गई तो पता चला की कर्म पर भी तुम्हारा अधिकार नही, फिर थोड़ी और अंदर गई तो, पता चला की कर्ता को देखो, और लगा की करने वाला कोई है ,और जब गीता और अंदर तक गुश गई, तो पता की करने वाला ही कोई नहीं है, सब प्राक...
Bhai ye Book hai ya print Kiya hua paper hai bataye mujhe