
मुस्कान जी, यही तो असली मिलना है, किसी और से नहीं, अपने आप से। बाकी सब किताबें बाहर की दुनिया दिखाती हैं, यह एक भीतर का शीशा दिखा देती है 💝 अब बस पढ़ना नहीं, उसमें जो दिखे उसे रोज़ जीना है। सत्रों और परीक्षाओं से जुड़े रहिए, यह मिलना वहीं गहरा होता है।