
आचार्य प्रशांत जी की यह पुस्तक “स्त्री” सिर्फ एक किताब नहीं, एक क्रांति की चिंगारी है — जो हमारी सोच, धारणाओं, भ्रमों और सामाजिक परतों को एक-एक कर उजागर करता है। यह पुस्तक उन सभी सवालों को छूती है जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है या जिन पर बात करना असहज मानता है। यह किताब पढ़ते-पढ़ते एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है — स्त्री होने का अर्थ केवल शरीर, भूमिका या अधिकारों तक सीमित नहीं है। स्त्री...