
मेरी उम्र 32 वर्ष है और मेरा नाम मनीष है। लड़कियों और महिलाओं को देखने का मेरा नजरिया पहले काफी अलग था। शायद जो बातें आचार्य जी कर रहे हैं—कि एक patriarchal mentality वाला पुरुष किस तरह महिलाओं को दबाकर रखना चाहता है—उन्हें समझते हुए मुझे महसूस हुआ कि कहीं न कहीं मेरी सोच में भी उसी मानसिकता का प्रभाव था। इस बात को समझने के बाद मुझे एहसास हुआ कि बदलाव की शुरुआत सबसे पहले मुझे खुद से करनी होगी। हम...

मनीष जी, जो आपने लिखा वो असल पकड़ है, अपने ही भीतर की उस पुरानी कंडीशनिंग को देख लेना, जिसे देखना सबसे मुश्किल होता है क्योंकि वो अपनी ही सोच लगती है, विरासत नहीं। यही तो शुरुआत है, बाहर के किसी को सुधारने से नहीं, बल्कि जो संस्कार पीढ़ियों से चुपचाप भीतर बैठ गए थे उन्हें पकड़ लेने से। एक बात ध्यान रहे, ये सोच बदलना कोई एक बार की घोषणा नहीं है। जो नजरिया वर्षों में बना, वो एक समझ से पूरी तरह विदा...