
साधारणतया प्रेम हमारे लिए एक सांसारिक आकर्षण या मोह की छवि के रूप में जाना जाता है । आचार्य जी ने इस किताब के माध्यम से प्रेम के सही अर्थों को उद्घाटित किया है प्रेम,आत्मा,आनंद,अद्वैत ,स्वभाव आदि एक ही कोटि के शब्द हैं जो यह बताते है कि प्रेम कोइ प्राकृतिक घटना नहीं होती है अपितु यह हमारे न होने के भाव से उद्घाटित होता है अपितु मोह एक सांसारिक वृत्ति होती है