
इस पुस्तक ने मेरे अंदर चल रहे पुराने ढर्रों को तोड़ने में मदद की है। आचार्य जी ने इस पुस्तक के माध्यम से हमें सिखाया है कि प्रेम कोई इन्द्रियगत, मनगत, विचारगत वस्तु या भावना नहीं है। प्रेम तो मुक्ति के प्रति एक सहज, स्वत: स्फुरित आकर्षण है। एक ऐसा आकर्षण कि जो हमें पता भी नहीं लगने देता और हमें बहाकर ले जाता है। हम तो बहुत सुरक्षाप्रेमी जीव है। प्रेम का अर्थ तो उन सब सुरक्षाओं को, दायरों को, अपने...