
पुस्तक से मैने जाना कि– प्रेम/मोहब्बत/दीवानगी/इश्क की जो छवि हमने अपने मस्तिष्क में बना रखी है, जिसमें केवल एक नायक और नायिका पात्र होते है.. ये केवल फिल्मों और सुव्यवस्था की अध्यारोपित छवि है। ये प्रेम का कोई वास्तविक रूप नहीं। सिनेमा और समाज जो दिखाता है वो मोह/ अन्तःस्त्रावी आकर्षण/तन्हाई है। लेकिन जो ऋषियों और बुद्धों ने बताया वो प्रेम है, उन्मुक्त उड़ान है, स्वतंत्रता की मुक्त केलि है।