
यह उपनिषद पढ़ कर मुझे अपने सामाजिक, दैहिक व धार्मिक बंधनो की समझ आई है निरालंब उपनिषद ने मेरे भ्रम को तोड़ा व उद्धृत किया कि किस प्रकार संसार हमारे ऊपर बंधन लादता है व अहम अपने आपको किस प्रकार इन बंधनो से अपना आधिपत्य जमाता है उपनिषदों वो जो तुम्हारे दुख (बंधनों) से मुक्ति दिलाए ।