
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ३ पर आधारित

मैंने कर्मयोग को सिर्फ एक धार्मिक या गीता की व्याख्या समझकर पढ़ना शुरू किया था, लेकिन यह उससे कहीं ज्यादा गहराई वाली किताब निकली। यह किताब कर्म के पीछे छिपी मानसिकता को समझाती है, न कि सिर्फ “काम करते रहो” जैसी सामान्य बातों को। सबसे ज्यादा असर इस बात ने डाला कि हम अक्सर अपने कर्मों को फल, पहचान या डर के कारण करते हैं। किताब यह दिखाती है कि ऐसा कर्म हमें और उलझाता है, जबकि सही कर्म वह है जो स्पष्ट...