
गुरु बेचारा क्या करे” नाम थोड़ा अलग है, और किताब भी उसी तरह सीधी और बिना घुमाव की है। यह किताब गुरु-शिष्य संबंध को बहुत practical और थोड़ा कठोर नजरिए से देखती है। इसमें यह साफ कहा गया है कि अगर शिष्य खुद देखने और समझने को तैयार नहीं है, तो गुरु कुछ नहीं कर सकता। यह बात simple है, लेकिन अक्सर हम इसे मानते नहीं। मुझे इसमें यह अच्छा लगा कि यह अंध-भक्ति या blind following को बिल्कुल support नहीं करती।...

This book helps me understand what a teacher truly means. The purpose of life is to follow the Guru, because everything he says or does is for our welfare. If he scolds us or does something that does not seem good to us, then we are the ones who are wrong — our Guru cannot be wrong. The finger of doubt should always be pointed at ourselves, not at him. Ram may already reside within us, but only a ...

जीवन पर ज़रा ध्यान दीजिए! किताबें इसलिए हैं कि जब देने ही लगें ध्यान, जब आगे बढ़ने ही लगें तो अगला कदम और स्पष्ट होता जाए। पर जिसने अभी पहला ही कदम नहीं लिया, अगला कदम उसके किस काम का है? और पहला कदम है अभी, क्योंकि जीवन है अभी, सामने। और ये बात बिलकुल ठीक है, अभी यह दो लोग आए हैं अंदर (सत्र कक्ष में)। मैं इन दोनों के साथ होता हूँ, दोनों के साथ बड़ी अलग-अलग बातें होती हैं। तो मैं क्या बोल रहा हूँ, य...