
इस पुस्तक को पढ़कर इतना तो समझ आया कि महिषासुर कहीं बाहर नहीं है वह हमारे अंदर ही है। इस पुस्तक में आचार्य जी धार्मिक प्रतीकों ,देवी के रूपों और असुरों के साथ युद्ध को केवल पौराणिक कहानियों की तरह नहीं बल्कि हमारे मन के भीतर चल रहे संघर्षों को भी बताया है। महिषासुर, शुंभ-निशुंभ जैसे राक्षस हमारे भीतर के अहंकार, वासना, लोभ, मोह आदि का प्रतिनिधित्व करता है। हम हर चीज को बाहर ढूंढते हैं। मां दुर्गा द...