
डर मेरी पसंदीदा पुस्तकों में से एक है। मुझे डर बहुत ही अधिक था। हर एक बात पर दूसरों का मुंह देखा करते थे। कुछ भी नया करने से पहले एक डर बना रहता था कि पता नहीं क्या होगा। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मुझे समझ में आ गया कि जीवन डरने के लिए नहीं खुल कर खेलने के लिए मिला है। ऐसी बोधगम्य पुस्तकें और गीता सत्रों में उपस्थिति जीवन में चार चांद लगा देती है

नमस्कार कृति जी, क्या आप Mission 5MN Shorts Group में हैं?