
जब मैं आचार्य की किताबें पढ़ना शुरू की थी तो यह मेरी दूसरी किताब थी जिसको मैंने पढ़ना शुरू किया था, क्योंकि जिंदगी में इतना डर था कि उसका कोई उपाय मुझे नजर नहीं आ रहा था हर चीज में डर, हर छोटी चीज से लेकर हर बड़ी चीज में डर रहता था। जब मैंने जब इसे पढ़ना शुरू किया तब मुझे समझ में आने लगा कि हमारा सारा डर इसी बात का है कि हम खौफनाक दुनिया में आ गए हैं और इस जगह लूटने का खतरा है हमारा डर यही रहता है...

आचार्य जी की सभी बुक एक से बढ़कर एक हैं। मैंने दुर्गासप्तशती पुरी पढ़ी प्रेम आधी पढूं हूं और अष्टावक्र गीता भी पढ़ रही हूं। सब बहुत बहुत खास हैं 🪔

अब तो प्रेम ही सीख रही।

मै रखी हूं ये पुस्तक लेकिन पढ़ी नहीं हूं लेकिन प्रारंभ करूंगी