
🔰 पुस्तक से कुछ सुंदर उक्तियां : मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया। आपकी बात जैसे-जैसे ग़लत साबित होती जाती है, आप वैसे-वैसे सही होते जाते हो। ये दोनों बातें एक साथ — बाहर पत्थर सी कठोरता, भीतर एकदम नाज़ुक, संवेदनशील, सूक्ष्म हृदय। “मैं हिन्दुस्तान हूँ, मैंने जब भी उन्हें उजाले से जोड़ा है, उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है, तोड़ा है। मगर इतिहास ...

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