
मन के मते ना चालिए

विद्रोही मन” एक बहुत ही गहरी और सोच को झकझोर देने वाली किताब है। यह हमें यह समझाती है कि विद्रोह का मतलब केवल समाज के खिलाफ जाना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के झूठ और अज्ञान के खिलाफ खड़ा होना है। इस किताब को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह समझ आया कि हम अक्सर बिना सोचे-समझे अपनी ही आदतों, इच्छाओं और डर के गुलाम बन जाते हैं। असली स्वतंत्रता तब आती है जब हम इन सबको पहचानकर उनसे ऊपर उठते हैं। लेखक ने बहु...

🔰 पुस्तक से कुछ सुंदर उक्तियां : मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया। आपकी बात जैसे-जैसे ग़लत साबित होती जाती है, आप वैसे-वैसे सही होते जाते हो। ये दोनों बातें एक साथ — बाहर पत्थर सी कठोरता, भीतर एकदम नाज़ुक, संवेदनशील, सूक्ष्म हृदय। “मैं हिन्दुस्तान हूँ, मैंने जब भी उन्हें उजाले से जोड़ा है, उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है, तोड़ा है। मगर इतिहास ...