
तुम भेड़ नहीं, फिर भेड़ के पीछे क्यों?” एक छोटी लेकिन बहुत गहरी सोच देने वाली किताब है। यह हमें यह समझाती है कि हम अक्सर बिना सवाल किए समाज और भीड़ के पीछे चलने लगते हैं, और यही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है। इस किताब की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यह सीधे और सरल शब्दों में हमारी आदतों और सोच पर सवाल उठाती है। इसे पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा कि यह किताब मेरे ही जीवन के फैसलों पर रोशनी डाल रही है। इसने मुझ...