
परिवार, संस्कृति, स्कूल, कोचिंग संस्थान, कॉलेज आदि ये सब व्यवस्थाएं हैं। और हम इन व्यवस्थाओं के द्वारा चलाए जाते रहने से मान लेते हैं कि हम तो भेड़ हैं। हमें चलाने के लिए सदा एक व्यवस्था चाहिए। यह पुस्तक हमारी इसी मानसिकता (भेड़ चाल) को ध्वस्त कर हमें वो रोशनी देती है जिसमें हम देख पाएं कि किसी व्यवस्था के द्वारा संचालित न होकर भी जीवन जिया जा सकता है।