
बाहर से प्रकृतिस्थ, भीतर से आत्मस्थ

पुरुषार्थ” एक ऐसी किताब है जो जीवन के उद्देश्य को लेकर हमारी सामान्य सोच को पूरी तरह बदल देती है। इसे पढ़ते हुए मुझे एहसास हुआ कि हम अक्सर सफलता, धन और इच्छाओं को ही जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं, जबकि असली उद्देश्य कुछ और ही होता है। किताब बहुत सरल भाषा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों को नए नजरिए से समझाती है। यह केवल परंपरागत अर्थों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उन्हें आज के जीवन से जोड़...