
मैंने इस पुस्तक को पढ़कर ये जाना कि हम चाहे जितने भी प्रयास कर लें क्लाइमेट चेंज को रोकने के लिए। पर ये सारे प्रयास दो कौड़ी के भी नहीं जब तक कि हम स्वयं को नहीं जानते हैं। क्लाइमेट चेंज हमारे अज्ञान का ही दूसरा नाम और रूप है।इसे सुधारें के लिए हमें स्वयं के झूठ को जानना होगा।जब तक हम इस भ्रम में हैं कि हम स्वस्थ है तब तक हम जो भी करें अंततः नुकसान ही होगा–हमारा भी पृथ्वी का भी। इसका एक ही समाधा...