
सबसे पहले मैं आचार्य जी और कम्युनिटी की शुक्रगुज़ार हूँ । इस पुस्तक से स्पष्टता मिली है कि जलवायु माने क्या ? हमारे आस - पास क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? कहाँ से आ रहा है ? और जलवायु सिर्फ कोई हमसे अलग बाहर कोई व्यवस्था नहीं वो हम ही है । ये बात पहले इन्फोर्मेटिव भी नहीं थी लेकिन अब ये बात भीतर तक घर कर गई है और इस लिए हो पाया क्योंकि इससे पहले गीता आई, कृष्ण आए । और इसी की पहल की है विगन था...