
पहले मैं भगवद्गीता को एक धार्मिक (जादुई) ग्रंथ समझता था कि इसे बस पड़ना होता है और पुण्य मिलेगा। सिर्फ आचार्य जी की वजह से ही समझ पाया कि भगवद्गीता "आत्मज्ञान" की पुस्तक है और इसे बिना समझे तो जीवन जीना भी सम्भव नहीं हैं। मुझे नया जीवन मिला है भगवद्गीता से।