
यह पुस्तक कृष्ण के जन्म और अवतार से जुड़ी हमारी उन पुरानी धारणाओं को तोड़ती है जो महानता को शरीर या बाहरी दुनिया में खोजती हैं। यह स्पष्ट करती है कि कृष्ण बाहर किसी विशेष देह में नहीं, बल्कि हमारे अपने अहंकार (मैं भाव) के विगलन पर प्रकट होते हैं। पुस्तक नायक-पूजा और 'कोई बाहर से आकर हमें बचाएगा' जैसी कमज़ोर कर देने वाली झूठी उम्मीदों पर गहरी चोट करती है। यह हर उस व्यक्ति के लिए एक जीवन-परिवर्तक उपह...